उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटा, फैसले के बाद फिर चर्चा में आए पुराने विवाद

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उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटा, फैसले के बाद फिर चर्चा में आए पुराने विवाद

 



भोपाल। मध्य प्रदेश की राजनीति में उपचुनाव को लेकर हलचल तेज है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं दिए जाने के बाद प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। राजनीतिक विश्लेषक इसे पार्टी की नई रणनीति और नेतृत्व के संदेश के रूप में देख रहे हैं।





नरोत्तम मिश्रा लंबे समय तक प्रदेश की राजनीति में प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते रहे हैं। हालांकि, उनके राजनीतिक जीवन के दौरान कई विवाद भी सामने आए, जिन्हें लेकर समय-समय पर विपक्ष ने सवाल उठाए। टिकट नहीं मिलने के बाद एक बार फिर उनके पुराने विवाद और आरोप चर्चा का विषय बन गए हैं।






ये रहे प्रमुख विवाद

पेड न्यूज मामला (2008 विधानसभा चुनाव):

वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव में उन पर कथित रूप से 'पेड न्यूज' प्रकाशित कराने और चुनाव खर्च का सही विवरण प्रस्तुत नहीं करने के आरोप लगे थे। वर्ष 2017 में चुनाव आयोग ने उन्हें तीन वर्ष के लिए अयोग्य घोषित किया था। बाद में मामला न्यायालय पहुंचा और आगे की कानूनी प्रक्रिया चली।

267 करोड़ रुपये के टेंडर का मामला:

शहरी विकास मंत्री रहते हुए उन पर हैदराबाद की एक निर्माण कंपनी को 267 करोड़ रुपये का ठेका देने के बदले रिश्वत लेने के आरोप लगाए गए थे। आरोपों में शेल कंपनियों के जरिए धन के लेन-देन की बात भी कही गई थी। हालांकि, बाद में उन्हें आयकर अपीलीय प्राधिकरण (ITAT) से राहत मिली थी।

ई-टेंडरिंग मामला (2019):

मध्य प्रदेश के चर्चित ई-टेंडरिंग मामले में भी उनका नाम सामने आया था। आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने उनके कुछ सहयोगियों और निजी सचिवों के खिलाफ कार्रवाई की थी। हालांकि, जांच एजेंसियों को उनके खिलाफ प्रत्यक्ष रूप से कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिले।


ई-टेंडरिंग मामला (2019):

मध्य प्रदेश के चर्चित ई-टेंडरिंग मामले में भी उनका नाम सामने आया था। आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने उनके कुछ सहयोगियों और निजी सचिवों के खिलाफ कार्रवाई की थी। हालांकि, जांच एजेंसियों को उनके खिलाफ प्रत्यक्ष रूप से कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिले।

2020 का कथित स्टिंग वीडियो:

कमलनाथ सरकार के दौरान सामने आए एक कथित स्टिंग वीडियो में उन पर कांग्रेस विधायकों की खरीद-फरोख्त में शामिल होने के आरोप लगाए गए थे। यह मामला भी राजनीतिक बहस का विषय बना रहा, हालांकि आरोप न्यायालय में सिद्ध नहीं हुए।

राजनीतिक विरोधियों के आरोप:

विपक्षी दलों और कुछ स्थानीय नेताओं ने समय-समय पर उन पर राजनीतिक प्रभाव का उपयोग कर विरोधियों पर दबाव बनाने और प्रशासनिक तंत्र के दुरुपयोग के आरोप लगाए। इन आरोपों का भी कोई अंतिम न्यायिक निष्कर्ष सामने नहीं आया।


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