जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की बेंच ने मातृत्व अवकाश को महिला का मौलिक अधिकार बताते हुए स्पष्ट किया कि यदि किसी महिला कर्मचारी का गर्भपात हो जाता है और उसके बाद वह दोबारा गर्भवती होती है, तो पिछला मेडिकल अवकाश या गर्भपात संबंधी छुट्टी उसके नए मातृत्व अवकाश का अधिकार छीन नहीं सकती। महिला को दूसरे गर्भधारण पर भी पूरे 90 दिनों का मातृत्व अवकाश कानूनी रूप से मिलेगा।
मातृत्व अवकाश कोई कृपा नहीं, संवैधानिक अधिकार
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की सिंगल बेंच ने मातृत्व अवकाश नियम 1961 का हवाला देते हुए कहा कि मातृत्व अवकाश कोई कृपा नहीं, बल्कि महिला का संवैधानिक अधिकार है, जो अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार से जुड़ा है। कोर्ट ने जोर दिया कि विभाग लीव बैलेंस न होने का हवाला देकर मातृत्व लाभ से वंचित नहीं कर सकता।
यह है मामला
प्रकरण के अनुसार एफसीआई रायपुर की महिला कर्मचारी 2019 में गर्भवती हुई। जांच में पता चला कि उसको जुड़वां बच्चों की पुष्टि हुई। लेकिन जटिलताओं के कारण एक भ्रूण का मिसकैरेज हो गया। उन्होंने दूसरा बच्चा जन्म दिया। महिला ने मातृत्व अवकाश, मेडिकल बिल और संबंधित लाभों के लिए आवेदन किया, लेकिन विभाग ने केवल 68 दिनों का बिना वेतन अवकाश मंजूर किया। लीव बैलेंस न होने का हवाला देते हुए उनके वेतन से 80,254 रुपये की कटौती कर दी गई. बाकी मेडिकल बिल (लगभग 3.76 लाख रुपये) भी लंबित रखे गए। कोर्ट ने काटे गए रुपये तुरंत वापस करने और बाकी मेडिकल बिलों की दोबारा जांच कर उचित भुगतान करने के निर्देश दिए।


