बिलासपुर (छत्तीसगढ़)। न्यायधानी बिलासपुर के तोरवा स्थित मुक्तिधाम से एक अत्यंत संवेदनशील और जनभावनाओं को आहत करने वाला मामला सामने आया है। सनातन परंपरा और सामाजिक मान्यताओं में जिस मुक्तिधाम को अंतिम यात्रा का पवित्र स्थल माना जाता है, वहाँ इंसानों के शवों के साथ-साथ मृत जानवरों (मवेशियों) के दाह-संस्कार का मामला गरमा गया है। स्थानीय पत्रकार एवं प्रवीर भट्टाचार्य द्वारा सोशल मीडिया (फेसबुक) पर इस गंभीर स्थिति को उजागर करने के बाद शहर में आक्रोश और प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं।
दैनिक वेतनभोगी के भरोसे मुक्तिधाम की व्यवस्था
प्राप्त जानकारी के अनुसार, तोरवा मुक्तिधाम की संपूर्ण देखरेख केवल नगर निगम के एक दैनिक वेतनभोगी (मस्टर रोल/टास्क बेस) चौकीदार के भरोसे चल रही है। वहाँ किसी भी नियमित अधिकारी या ज़िम्मेदार प्रशासनिक कर्मचारी की तैनाती नहीं है। मुक्तिधाम में आने वाले शवों के पंजीयन, देखरेख और मर्यादा बनाए रखने के लिए कोई ठोस व्यवस्था मौजूद नहीं है। इसी प्रशासनिक शून्यता का नतीजा है कि मुक्तिधाम परिसर में मवेशियों को जलाए जाने जैसी अमर्यादित घटनाएँ सामने आ रही हैं।
रेलवे की आपत्तियों के कारण अटका विकास कार्य
मुक्तिधाम की दुर्दशा का एक बड़ा कारण रेलवे और स्थानीय प्रशासन के बीच का समन्वय न होना भी बताया जा रहा है। मुक्तिधाम से लगे रेलवे विभाग के नियंत्रण के कारण यहाँ किसी भी प्रकार का नया निर्माण या स्थाई बुनियादी विकास कार्य करने में तकनीकी और कानूनी बाधाएँ उत्पन्न होती हैं। इस खींचतान की वजह से मुक्तिधाम बुनियादी सुविधाओं से वंचित है और नगर निगम भी यहाँ ठोस इंतज़ाम करने से बचता नज़र आता है।


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