चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा, जस्टिस रवीन्द्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने यह फैसला विद्युत मंडल के पूर्व कर्मचारी की अपील खारिज करते हुए दिया। मामले के अनुसार कर्मचारी को सहायक श्रेणी-1 (सिविल) के पद पर नियुक्त किया गया था और बाद में उसे पर्यवेक्षक (सिविल) पद पर पदोन्नत किया गया। उसके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत मामला दर्ज हुआ था। विशेष अदालत ने उसे दोषी ठहराया, जिसके बाद विभाग ने उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया।
दोषसिद्धि के खिलाफ कर्मचारी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। इस दौरान वह रिटायरमेंट की आयु भी पूरी कर चुका था। बाद में हाईकोर्ट ने उसकी दोषसिद्धि रद्द करते हुए उसे आरोपों से बरी किया। इसके बाद विभाग ने बर्खास्तगी का आदेश वापस ले लिया और उसे काल्पनिक रूप से सेवा में बहाल माना लेकिन बर्खास्तगी से लेकर सेवानिवृत्ति तक की अवधि का वास्तविक वेतन और अन्य आर्थिक लाभ देने से इनकार कर दिया। कर्मचारी ने इस निर्णय को चुनौती दी लेकिन सिंगल बेंच ने उसकी याचिका खारिज की। पुनर्विचार याचिका भी निरस्त होने पर उसने डिवीजन बेंच में अपील की।
अपीलकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि जब दोषसिद्धि टिक नहीं पाई और उसे सम्मानपूर्वक बरी कर दिया गया, तब उसे सेवा से बाहर रहने की अवधि का वेतन और भत्ते मिलने चाहिए। सुनवाई के बाद डीबी ने कहा कि कर्मचारी की बर्खास्तगी उस समय प्रभावी और वैध दोषसिद्धि के आधार पर की गई। इसलिए बाद में अपील में बरी हो जाने से दोषसिद्धि के आधार पर पहले से हुई कार्रवाई शून्य नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट भी अपने कई फैसलों में स्पष्ट कर चुका है कि यदि किसी कर्मचारी को आपराधिक मामले में दोषसिद्धि के कारण सेवा से हटाया गया हो तो बाद की बरी होने की स्थिति में वह बकाया वेतन का दावा अधिकार के रूप में नहीं कर सकता।

