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लाल बहादूर शास्त्री स्कूल मैदान में संगीतमय रामकथा का आयोजन, विजय कौशल महाराज ने बताया कि सुंदरकांड पाठ का महत्व

 



बिलासपुर। संसार में केवल दो नाम ही सुंदर है। राम और श्याम। प्रातः काल उठते ही काम-और हनुमान जी का स्मरण करना चाहिये। कुछ अज्ञानी सुबह-सुबह हनुमान जी का नाम लेने से मना करते हैं। महिलाओं को भी हनुमान जी का पाठ-पूजा करने से मना किया जाता है। माता स्वरूप महिलाओं को सदैव हनुमान जी की पूजा-पाठ करना चाहिये। इसी प्रकार पूजा-पाठ के बीच उठना नहीं चाहिये, केवल अनुष्ठानों के बीच में नहीं उठना चाहिये।








लाल बहादूर शास्त्री स्कूल मैदान में आयोजित संगीतमय रामकथा में आज संत श्री विजय कौशल महाराज ने बताया कि सुंदरकांड का पाठ निरंतर करते रहना चाहिये। वह सिद्धि का कांड है, जो सभी प्रकार के दुखों का नाश करती है। उन्होंने कहा कि अपने घरों के बुजुर्गों की बात सुहानी और आसान हो लगे, हर कार्य सरल जाता है। उन्होंने बताया कि हनुमान जी विवेकी हैं। भगवान उन्हें सदैव अपने पास रखते थे। माता जानकी के आशीर्वाद से ही उनका रूप शरीर वज्र गुणों की वजह से बना हुआ है। इन्हीं गुणों की वजह से भगवान के प्यारे रहे। संत श्री ने बताया कि आज पूरे देश में भगवान राम से अधिक मंदिर हनुमान जी के हैं। हनुमान जी का शरीर साधारण नहीं है। माता जानकी के आशीर्वाद से ही उनका शरीर वज्र रूप में बना हुआ है। वे अष्ट सिद्धि और नव निधि के दाता हैं। हनुमान जी ने सुग्रीव जी, भरत, माता जानकी—सभी को प्रभु श्रीराम से मिलवाया। महाराज जी ने कहा कि भगवान राम ने सीता जी की खोज के लिये वानर सेनाओं को निर्देश दिए। भगवान श्रीराम जी ने हनुमान जी को बुलाकर माता सीता से मिलने को कहा। उन्होंने कहा कि माता सीता किसी से बात नहीं करतीं, जब वह मिलेंगी तब तुम उन्हें मेरी मुद्रिका दे देना और मेरे लिये कृपानिधाम बोलना, तब वे समझ जाएँगी कि तुम हमारे दूत हो। हनुमान जी समुद्र पार कर लंका गए और वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि राक्षस और राक्षसियाँ नशे में धुत हैं। फिर घूमते-घूमते वे विभीषण के पास पहुँच गए, जहाँ घर के सामने माता तुलसी का पेड़ देखकर वे गद्गद हो गए। उन्होंने समझ लिया कि यह विभीषण का घर है। इसके बाद उन्होंने अशोक वाटिका पहुँचकर उन्होंने माता सीता को देखा, जो विलाप करते हुए बैठी थीं। उन्होंने उसी वृक्ष के ऊपर बैठकर भगवान की महिमा सुनानी शुरू की। महाराज जी ने बताया कि रावण कभी माता सीता जी के पास अकेले नहीं आता था, रात में भी वह अकेला नहीं आया। रावण के जाने के बाद हनुमान जी ने माता सीता से बात करने से पहले उन्हें प्रभु श्रीराम की मुद्रिका दिखाई। माता सीता ने उसे पहचान लिया और हनुमान जी से पूछा कि यह मुद्रिका कहाँ से मिली। तब हनुमान जी ने बताया कि प्रभु ने यह मुद्रिका पहचान के लिये दी है और आप भी प्रभु को दिखाने के लिये कुछ दें। हनुमान जी प्रभु के लिये ‘करुणानिधान’ शब्द का प्रयोग करते हैं। तब सीता जी ने उनसे खुलकर बात की और अपनी व्यथा सुनाई। हनुमान जी को भूख लगी थी, तो उन्होंने माता सीता से खाने के लिये कुछ माँगा। तब उन्होंने वृक्ष में लगे पके फलों से भूख मिटा लेने को कहा। हनुमान जी वाटिका में घूम-घूमकर फल तोड़ने लगे। उन्होंने पेड़-पौधों को नुकसान पहुँचाया और डालीयाँ तोड़ दीं। तब उन्हें रावण के दूतों ने पकड़ लिया और सभा में उपस्थित रावण के पास ले गए। रावण ने उन्हें कई प्रकार से दंड देना चाहा, किंतु विभीषण के हस्तक्षेप के बाद उनकी पूँछ में आग लगा दी गई। हनुमान जी की पूँछ में आग लगा दी गई। वे घूम - घूम कर पूरी लंका को जला दिया। इसी बीच आग बुझाने के लिये इंद्रदेव घने काले-काले बादल लेकर पहुँचे। हनुमान जी क्रोधित हो गये। तब इंद्र ने कहा कि ये काले बादल दिखावटी हैं, इनमें पानी नहीं है। इस प्रकार हनुमान जी पूरी लंका को जला कर वापस लौट गये और भगवान राम को पूरी कथा बताई। भगवान राम क्रोधित हो गये। युद्ध करने श्रीलंका चलने का आदेश दिया। किंतु रास्ते में समुद्र पड़ता है, यह जानकर वे सोचने लगे। तभी लक्ष्मण जी ने अग्निबाण चला कर समुद्र को सुखा देने की बात कही। तब सागर को घबड़ाहट होने लगी। उसने बताया कि आपकी सेना में नल-नील दो भाई हैं, समुद्र में पत्थर फेंकेंगे तो वह तैरने लगेगा और आवागमन मार्ग निष्कंटक हो जायेगा। इसके पूर्व विभीषण जी भी राम से मिलने आ गये थे। श्रीराम उन्हें लंकेश कह कर अपने पास बुला लेते हैं। कथा के प्रसंग में महाराज जी ने बताया कि भक्तों की कभी मृत्यु नहीं होती, भक्त केवल अंतर्ध्यान हो जाते हैं। मंदोदरी ने भी रावण से निवेदन किया कि माता सीता को ससम्मान पहुँचा दें। इस पर रावण अत्यंत क्रोधित हो गया। तब मंदोदरी भी गुस्सा प्रकट करते हुए कक्ष में जाकर अपने सभी आभूषण निकाल दी और कहने लगी की मै आज से ही विधवा हो गई हूँ। विभीषण द्वारा भी इसी प्रकार का सुझाव देने पर रावण ने उस पर लातों से प्रहार कर दिया। माता सीता हनुमान जी से कहती हैं कि यदि एक माह तक प्रभु नहीं आएँगे, तब मैं चिंता में आग लगा कर अपनी इहलीला समाप्त कर लूँगी। महाराज जी ने सुंदरकांड के बारे में कहा कि यह अद्वितीय है। इसे पढ़ने मात्र से ही कष्ट और भय दूर हो जाते हैं। इसे रोज पढ़ना चाहिये। यदि रोज संभव न हो तो शनिवार और मंगलवार को इसका पाठ अवश्य किया करें।

लाल बहादूर शास्त्री स्कूल में आयोजित रामकथा का आज अंतिम दिन है। कथा प्रारंभ होने का समय प्रातः 9.30 बजे रखा गया है।



कार्यक्रम के प्रारम्भ में मुख्य संरक्षक श्री अमर अग्रवाल , श्रीमती शशि अग्रवाल, महेश अग्रवाल , गुलशन ऋषि, गोपाल शर्मा,युगल शर्मा 

 कच्छ गुर्जर समाज, नगर साहू संघ, जैन श्वेताम्बर  संघ, विन्ध्याचल सांस्कृतिक मंच, सूत सारथी समाज, सनाढ्य विकास मंच, गोंड भूमिकाल समाज, विन्ध्य बिलासा सांस्कृतिक मंच, उत्कल समाज, कुर्मी क्षत्रिय सेवा समिति, भारतीय सुदर्शन समाज,गोस्वामी समाज , प्रगतिशील युवा स्वर्णकार समाज,राजपूत क्षत्रिय चौहान समाज , अयोध्या वाशी वैश्य समाज कार्यक्रम के अंत में श्री अमर अग्रवाल , श्रीमती शशि अग्रवाल, विधायक धर्मजीत सिंह आदि गणमान्यजन आरती में शामिल रहे

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