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जानें क्यों छत्तीसगढ़ में बढ़े घर के रेट , 40 परसेंट का है सारा खेल

 






रायपुर। एक नवंबर 2000 से पहले रायपुर एक संभागीय मुख्यालय था। जहां सबसे बड़े आफिसर के तौर पर कमिश्नर बैठते थे। उस समय स्टील का कारोबार अच्छा फैल गया था मगर खुदरा से कपड़े, फनीर्चर या फिर रियल इस्टेट की स्थिति बाकी जिलों के जैसी ही थी। छत्तीसगढ़ राज्य और रायपुर के राजधानी बनते ही रायपुर के रियल इस्टेट में आग लग गई। वहीं बिल्डरों के कारोबार में बूम आ गया। छोटे-छोटे बिल्डर 2005 आते-आते अरबों में अपना सम्राज्य स्थापित कर लिया।

मंत्रियों और नौकरशाहों का इंवेस्टमेंट


रायपुर राजधानी बनते ही मंत्री से लेकर बोर्ड, आयोगों का गठन तो हुआ ही भोपाल से बड़ी संख्या में आईएएस, आईपीएस रायपुर आए। चूकि छत्तीसगढ़ नया प्रदेश था, सो संभावनाए असीमित थी। मंत्रियों से लेकर नौकरशाहों ने बहती गंगा में जमकर डूबकी लगाई। सबसे पहले नेताओं और नौकरशाहों ने रायपुर के चारों तरफ के लगभग 60-70 किलोमीटर एरिया के सारे जमीन खरीद लिए। जब जमीनों में इंवेस्टमेंट हो गया तो फिर बिल्डरों के प्रोजेक्टों में निवेश प्रारंभ हुआ। साल 2010 आते-आते रायपुर के बिल्डरों ने ऐसा ग्रोथ किया कि बाहर के लोग आवाक थे। लोगों को आश्चर्य हो रहा था कि रायपुर में इतना पैसा कहां से बरस रहा जबकि, मकान बिकने का औसत ग्रोथ अपेक्षाकृत कम है तो फिर मकान और फ्लैट बनाने की होड़ कैसे मच गई है?

करोड़ों में दो नंबर की राशि


छत्तीसगढ़ का सलाना बजट 5 हजार करोड़ से चालू हुआ था और एक लाख करोड़ से उपर पहुंच गया है। चाहे बीजेपी का टाईम हो या कांग्रेस का, कई मंत्री 30 से 40 परसेंट कमीशन लेते थे। इसके अलावा नौकरशाहों का अपना हिस्सा। इतने बड़े बजट में हर साल कमीशन की राशि निकालेंगे तो हजार करोड़ से उपर जाएगा। और पूरा कैश में आना है। मुठ्ठी भर बड़े लोग इस पैसे को बड़े उद्योगों में या फिर गुड़गांव जैसे जगहों पर इंवेस्ट कर देते हैं। लेकिन, बाकी पैसे यही लगते हैं।


40 परसेंट तक महंगे


जानकारों का आंकलन है कि रायपुर जैसे देश के शहरों में यहां से 30 से 40 परसेंट कम रेट में प्रायवेट बिल्डर के मकान मिल जाते हैं। मगर रायपुर में दिल्ली, मुंबई, पुणे, बंगलुरू टाईप घरों और फ्लैट के रेट हैं। सिर्फ इसलिए कि अधिकांश बिल्डरों को रेट के मामलों में समझौता करने की कोई मजबूरी नहीं। क्योंकि, पैसा उनका लगा नहीं।

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