बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि यदि किसी व्यक्ति को अदालत के आदेश अनुसार न्यायिक हिरासत में रखा गया है, तो उसे अवैध हिरासत नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दी गई असाधारण शक्तियों का उपयोग कर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर नहीं की जा सकती।
जांजगीर-चांपा जिले के बिर्रा थाना अंतर्गत ग्राम करही निवासी रविशंकर बघेल ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। याचिका के अनुसार, बिर्रा थाना पुलिस ने उसके भाई गणपत बघेल को अवैध रूप से हिरासत में रखा है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से भाई की रिहाई की मांग की।
आरोपी ज्यूडिशियल रिमांड पर
राज्य शासन की ओर पैरवी करते हुए सरकारी वकील ने तथ्यात्मक दस्तावेज पेश करते हुए बताया कि आरोपी गणपत बघेल के खिलाफ बिर्रा थाने में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 103(1) (हत्या), 331(8), 109(1), 61(2), 238 और आर्म्स एक्ट की धारा 25 व 27 के तहत गंभीर आपराधिक मामला दर्ज है। लॉ अफसर ने डिवीजन बेंच को बताया, पुलिस ने 27 मई 2026 को ही आरोपी को चांपा के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के कोर्ट में पेश किया था। मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट ने आरोपी को ज्यूडिशियल रिमांड पर जेल भेज दिया है।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा, जस्टिस बीडी गुरु की डिवीजन बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा, बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका केवल तभी विचारणीय होती है जब किसी व्यक्ति को पूरी तरह से अवैध या गैर-कानूनी ढंग से बंधक बनाया गया हो। चूंकि याचिकाकर्ता का भाई आपराधिक मामले में कोर्ट के आदेश के मद्देनजर ज्यूडिशियल कस्टडी में है, इसलिए इसे किसी भी स्थिति में अवैध निरुद्धता नहीं कहा जा सकता। इस टिप्पणी के साथ डिवीजन बेंच ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को खारिज कर दिया है।


