राम मंदिर आंदोलन, त्याग, तपस्या और बलिदान की शौर्य गाथा, जानिए प्रभु राम के लिए 28 साल अन्न का त्याग करने वाली उर्मिला चतुर्वेदी के बारे में
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राम मंदिर आंदोलन, त्याग, तपस्या और बलिदान की शौर्य गाथा, जानिए प्रभु राम के लिए 28 साल अन्न का त्याग करने वाली उर्मिला चतुर्वेदी के बारे में

 



राम मंदिर आंदोलन की कहानी किसी शौर्य गाथा से कम नहीं है. अगर आज राम मंदिर रहा है तो यह करोड़ों हिन्दुओं के त्याग,  तर्पण और बलिदान से संभव हुआ है. राम मंदिर निर्माण के लिए करोड़ों हिन्दुओं ने संघर्ष किया उनमें मध्यप्रदेश की उर्मिला चतुर्वेदी भी हैं. ६ दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे को गिरा दिया गया था। उस वक्त हुए विवाद को लेकर जब खून खराबा हुआ तो उर्मिला चतुर्वेदी विचलित हो गई थीं। तब इन्होंने संकल्प लिया कि जब तक अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण शुरू नहीं हो जाता तब तक ये अन्न ग्रहण नहीं करेंगी।


1992 के बाद से उन्होने लगातार फलाहार ले लिया हैं और उनका अधिकांश समय रामायण का पाठ करने और माला जपने में गुजरता रहा था ।

लेकिन जिस दिन सर्वोच्च न्यायालय ने राम मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया था। उन्होंने फैसला सुनाने वाले सुप्रीम कोर्ट के जजों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भेजकर बधाई दी थी।


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